Friday, August 21, 2026
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पूज्य श्री जलाराम बापा की 225 वी जयंती

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!! साधु चरित सुभ चरित कपासू !!
८ नवंबर के श्री जलाराम बाप्पा कि २२५ वी जयंती के अवसर पर विशेष 

मूल

संत तुलसीदासजी महाराज रामचरितमानस ग्रंथ में संतों का वर्णन करते हुए लिखते है “साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू ।। जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा ।।” ये चौपाई पूज्य संत श्री जलाराम बाप्पा के जीवन में भी चरितार्थ होती है। कार्तिक शुक्ल सप्तमी ता. ८ नवंबर २०२४ को २२५ वी जलाराम जयंती के अवसर पर आइये पूज्य बापा के जीवन में इस चौपाई का दर्शन करते है।

तुलसीदासजी कहते है- संतोंका चरित्र कपासके चरित्र (जीवन) के समान शुभ है, जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है। कपासकी डोडी नीरस होती है, संत-चरित्रमें भी विषयासक्ति नहीं है, इससे वह भी नीरस है, कपास उज्ज्वल होता है, संतका हृदय भी अज्ञान और पापरूपी अन्धकारसे रहित होता है, इसलिये वह विशद है, और कपासमें गुण (तन्तु) होते हैं, इसी प्रकार संतका चरित्र भी सद्‌गुणोंका भण्डार होता है, इसलिये वह गुणमय है । जैसे कपासका धागा सूईके किये हुए छेदको अपना तन देकर ढक देता है, अथवा कपास जैसे लोढे जाने, काते जाने और बुने जानेका कष्ट सहकर भी वस्त्रके रूपमें परिणत होकर दूसरोंके गोपनीय स्थानोंको ढकता है, उसी प्रकार संत स्वयं दुःख सहकर दूसरोंके दोषों को ढकता है, जिसके कारण उसने जगत्में वन्दनीय यश प्राप्त किया है।

संतोंके इन गुणों का दर्शन पूज्य संत श्री जलाराम बाप्पा के जीवन चरित्र में पग पग पर होता है। गुजरात के सौराष्ट्र प्रांत में बसे छोटे से गांव वीरपुर में धर्मपरायण दंपत्ति श्री प्रधानजी ठक्कर एवम् माता राजबाई के घर जलाराम बाप्पा का जन्म हुआ। बचपन में ही विलक्षण स्वभाव और महापुरूषों द्वारा भविष्यकथन से जलाराम बाप्पा असाधारण मानव होने की बात परिवारजनों को ज्ञात हो गई थी। आगे चलकर इसी बालक जला ने महामानव बनकर जगतमें वन्दनीय यश प्राप्त किया ।

कपासकी डोडी नीरस होती है, उसीतरह संत-चरित्रमें भी विषयासक्ति नहीं होती, ये बात तो बालक जला के बाल्यकाल में ही दिखाई देती थी। किन्तु उन्हे जब विवाह के लिए बहुत मुश्किल से मनाना गया, तब ये बात और अधिक स्पष्ट हो गई ।

वैराग्यवान बापा का दिन सेवा और सुमिरन में बीतता था और रात बीतती थी ईश्वर के भजन में। बापा एक सांस भी बिना हरिनाम के नहीं लेते थे, फिर उनका हृदय पापरूपी अन्धकारसे रहित था, विशद था, इस बात को अलगसे कहने की आवश्यकता ही नहीं। स्वयं कष्ट सहकर लोगों के दोष और दुःखों को मिटाने का प्रयास करते रहना ही बापा के जीवन का उद्देश्य था ।

बापा के हाथों साधु-संत, दीन-दुःखी और यात्रालु आदि की सेवा होती, तब वे कहते “जो कुछ भी हो रहा है, सब मेरे राम ही कर रहे है। मैं तो निमित्तमात्र हूँ, जो लोगों की सेवा करने का प्रयास कर स्वयं अपना ही कल्याण कर रहा हूँ।” ऐसी सरलता, निराभिमानता, परदुःखकातरता, उदारता, अनासक्ति, ईश्वरभक्ति आदि अनेक सद्‌गुणोंका भण्डार था बाप्पा का जीवन ।

“तुलसी जगमें आइके कर लिजे दो काम। देनेको टूकडा भला और लेनेको हरिनाम ।।” तुलसीदासजी की ये चौपाई तो मानो पूज्य बापा के जीवन का सार ही है। अपने गुरूदेव भोजलराम बापा से आज्ञा लेकर बापा ने अपने घर पर ही अन्नक्षेत्र शुरू किया। तब बापा के आंगन में हर रोज कई गरीब, जरूरतमंद और साधु-संत, यात्रालु आदि भोजन-प्रसाद पाकर तृप्त होते थे। बापा आज मानव शरीर में नहीं है, किन्तु उन्होने बहाई सेवा की गंगा आज भी निर्विघ्नरूपसे निरंतर बह रही है। वो गंगा जन-जन को शितलता और शांति देकर बापा के सूक्ष्म अस्तित्व का अहसास करा रही है।

बापा द्वारा वीरपुर में शुरू किया गया वो अन्नक्षेत्र तो उसी जगह में आज भी शुरू है ही, किन्तु उनकी दिव्य प्रेरणा से गुजरात, महाराष्ट्र और अन्य प्रदेशों में भी अनेकों मंदिर, अनेकों संस्थाओं में अन्नक्षेत्र चलाये जा रहे है। हर रोज हजारों लाखों लोग रामरोटी पाकर तृप्त हो रहे है।

अपनी देवीस्वरूपा धर्मपत्नी विरबाई के साथ खेतों में मजदूरी करके बापा ने अन्नक्षेत्र शुरू किया था। एक समय जब बापा के भण्डार में अनाज खतम हुआ था, तब सती वीरबाई ने अपने जेवर बापा को सौंपते हुए उन्हे बेचकर अन्नक्षेत्र शुरू रखने के लिए कहा था। और बापा ने वही किया था ।

निष्काम सेवा और भक्ति से बापा को सिद्धियाँ प्राप्त हुई थी। औरों के दुःख-दर्द सहज में ही मिटानेवाले बापाने स्वयं अपने कष्टों को मिटाने के लिए कभी किसी सिद्धि का उपयोग नहीं किया था। संकट और कष्टों को रामजी का प्रसाद मानकर वे मुस्कुराते हुए दीन-दुखियों की सेवा करते और मुख से रामनाम जपते रहते ।

एक समय पत्नी के जेवर बेचकर अन्नदान की सेवा जारी रखनेवाले बापा के वीरपुर स्थित उस संस्थान में गत करीब तीस वर्षों से नगद अथवा अन्य किसी भी रूप में कोई दान नहीं लिया जाता। वहाँ पैसे, नरीयल और अन्य कोई भी चीज-वस्तु अर्पण करना सक्त मना है। उस पवित्र स्थान में आज भी हर रोज सैकडों और विशेष पर्व के दिन हजारों लाखों लोग भोजन प्रसाद पाते है।

कहते है ऐसे संतों के जीवन चरित्र का वास्तविक वर्णन संत ही कर सकते है। साधारण मानव के बस की वो बात नहीं है। हमने संत तुलसीदासजी द्वारा वर्णित संत चरित्र का आधार लेकर थोडा प्रयास किया है। हमारा वो प्रयास पूज्य बापा की जयंती के अवसर पर उन्हीके चरणों में समर्पित करते हुए हम उन्हें कोटि कोटि वंदन करते है। राम नाम में लीन है, देखत सबमें राम। ताके पद वंदन करू, जय जय श्री जलाराम ।।

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Mehul Chandrakant Maniyar
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